होली, चोली और हमजोली- 2

मेरी Xxx डिजायर की कोई सीमा नहीं … मेरी एक इच्छा पूरी होती तो मन में दूसरी कोई कामना उपज जाती है. मेरे बॉस के लिए मेरे मन में क्या क्या चल रहा था?

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मेरी कहानी के पहले भाग
वासना की पुजारिन चुदक्कड़ लड़की
में आपने पढ़ा कि मैं वीनस सेक्स को पसंद करने वाली लड़की हूँ, एक ऑफिस में काम करती हूँ.
ऑफिस के करीब 35 लोगों के साथ मैं उत्तराखंड में जिन कॉर्बेट पार्क के एक रिसोर्ट में ‘लर्निंग इवेंट’ के लिए जा रही हूँ.
रास्ते में धामपुर के समीप हम सबने दोपहर का भोजन लिया.

अब आगे Xxx डिजायर कहानी:

सब खाना खाकर आलस्य में आ चुके थे और धीरे धीरे देखते ही देखते सब अपनी अपनी सीट पर सो गए।
मैं सुबह एक नींद ले चुकी थी.

मैंने दो सीट के बीच से पीछे देखा, दीपक मेरी सीट की ओर ही देख रहे थे और धीरज से हल्के स्वर में बातें कर रहे थे।

उन्होंने मुझे झांकते हुए देख लिया- अरे तुम सोई नहीं? हमें भी नींद नहीं आ रही, पीछे आ जाओ. ऐसा लगता है कि हम कुंभकरण की सेना लेकर आए हैं!

मैं पीछे चली गई.
धीरज मेरे दाहिनी ओर थे और दीपक मेरे बाएं ओर!

मेरे मन में थ्रीसम का लड्डू फूट रहा था।
पर मैं खुद को समझा रही थी कि दफ्तर के लोगों से उचित दूरी रहे, वही बेहतर है।

दीपक अपनी नौकरी और काम के बारे में बात करने लगे, धीरज भी बीच बीच में अपनी ओर से कुछ न कुछ बोलते।
पर मेरी Xxx डिजायर तो उन दोनों के लौड़ों को पाने की थी; मेरा बस चलता तो वहीं नीचे बैठ कर उनकी ज़िप खोल के उनके लौड़े चूसती।

दीपक और धीरज भी अपनी शुरुआती नौकरियों की कहानियां बताने लगे, बोले- आज के जमाने में तो कुछ भी नहीं होता, हमारे समय में तो नौकरी एनालिस्ट की होती थी और काम हम बॉस के नौकर का करते थे. वो कहते थे चाय लाओ, सिगरेट लाओ तो लेकर आते थे। तुम पीती हो सिगरेट?
मैंने कहा- नहीं।

“अभी छोटी है सर, क्या आप भी?” धीरज ने दीपक से कहा।
“अरे, तो तुमने और मैंने भी तो 21 – 22 में ही पीना शुरू किया था, और फिर ये तो …” बीच में रूक कर उन्होंने मुझसे पूछा- कितने साल की हो तुम?

“जी पच्चीस!” मैंने जवाब दिया।

“हां, ये तो फिर भी पच्चीस की है.” दीपक ने धीरज की बात का जवाब देते हुए कहा.

“घर में कौन कौन है तुम्हारे?” दीपक ने फिर पूछा.
“जी बस मैं और मेरे माता पिता, दीदी भी है, पर वो दूसरे शहर में रहती है.” मैंने जवाब दिया।

“शराब पीती हो?” अब धीरज ने पूछा।

उस वक्त तक मैं शराबन बन चुकी थी, शौकिया तौर पर चुदने से पहले शराब पीना मुझे अच्छा लगता था, मेरे कमरे में हमेशा शराब की बोतल छिपी रहती है, जिसे मैं उमड़ती हुई ठरक को शांत करने से पहले कोला या जूस में मिलाकर आज भी पीती हूं। होश की चुदाई के मज़े अलग होते हैं और नशे में होने वाली चुदाई के मज़े अलग।

फिर भी मैंने अपनी साफ छवि के लिए ‘नहीं’ में उत्तर दिया।

पहाड़ी रास्ता शुरू हो चुका था और अब मुझे खाना ऊपर चढ़ने लगा था। मेरा जी कच्चा हो रहा था, मेरे चेहरे के हाव भाव में भी बदलाव आ रहे थे।

तभी दीपक ने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया- ठीक हो तुम?
“नहीं … वो खाना ऊपर चढ़ रहा है.” मैंने अजीब सा चेहरा बनाते हुए कहा।

“कहो तो नीचे कर दें खाना?” ये कहते हुए दीपक मेरी पीठ सहलाने लगे.
दीपक के चेहरे पर शरारती मुस्कान थी।
मैं समझ रही थी कि वो मुझे छूने के बहाने ढूंढ रहे थे।

मैं वातानुकूलित बस में पसीने पसीने हो रही थी।

धीरज ने अपनी जेब से च्यूइंग गम निकाल के मेरे होंटों के आगे हाथ बढ़ाया- मुंह खोलो, इसे मुंह में रखो और चबाओ … हम सिगरेट पीने वालों के पास हमेशा च्यूइंग गम या माउथ फ्रेशनर रहता है।

खिलाते वक्त उनकी उंगलियां मेरे गुलाबी कोमल होटों को छुई तो बदन में सुरसुरी सी हुई.
दीपक ने भी वो सुरसुरी मेरी कमर पर रखे हाथ पर महसूस की।

अब दीपक का हाथ बार बार मेरी ब्रा के हुक को महसूस करता हुआ हिल रहा था, जैसे टटोल रहे हों कि मौका आने पर वो किस तरह मेरी ब्रा खोलेंगे।

आप सभी पाठकों के लिए बता दूं कि कामदेव की कृपा से मुझे काफी बड़े और मोटे उरोज़ प्राप्त हुए हैं, जो मेरे कच्ची उम्र में माहवारी होने से ही बढ़ने लगे थे।

25 की उम्र तक आते आते मेरी संतरे सी चूचियां, आम बन चुके थे और फिर मेरे साथ सोने वाले सभी मर्द इनका पूरा लुत्फ लेते थे।
अपने चूचों को मैं बिना पैड वाली ब्रा में कैद करके रखती थी और मेरी ब्रा भी अधिक सपोर्ट वाली 3 हुक की ब्रा थी।

चुइंग गम से असर नहीं हो रहा था तो दीपक ने बस किनारे लगवा दी और मेरे साथ बस से उतर गए.
मेरी हालत अब भी खराब थी।

उन्होंने कहा- थोड़ा खुली हवा में चलो, खाना नीचे हो जायेगा, पानी चाहिए हो तो बताना।

वो एक तरफ खड़े हुए धीरज के साथ सिगरेट पीने लगे।
मैं कुछ बीस कदम चली होऊंगी कि मुझे उलटी आ गई.

दीपक और धीरज दौड़ते हुए पानी के बोतल लेकर आए, धीरज ने मेरे बाल पकड़े और दीपक पानी से मेरा मुंह धोने लगे।

मैं झुकी हुई थी तो दीपक मेरी झूलती हुई, चूचियां साफ देख पा रहे थे.
मैंने दीपक की दोनों टांगों के बीच तनाव बनते देखा।

दीपक मेरे होंठों पर हाथ लगा मुझे कुल्ला करवा रहे थे.
धीरज ने मेरा एक हाथ पकड़ा था और मेरे बाल पकड़े थे।

दीपक रह रह कर धीरज की तरफ देख कर मुस्कुरा रहे थे।

मुंह धुलने के बाद में सीधी खड़ी हो गई तो पानी की कुछ बूंदें टपकती हुई मेरे गले से होते हुए सीने तक चली गई।
दीपक की नजर अब भी मेरे स्तनों पर थी।

मैं खड़ी हुई तो धीरज ने बाल छोड़कर दोनों हाथ मेरी कमर पर रख दिए जैसे मुझे पीछे से पकड़ कर चोदने वाले हों।

और दीपक ने मेरे दोनों कंधे पकड़ कर पूछा- अब ठीक हो?
उनकी नज़रें मेरी छाती में गड़ी जा रही थी।

मैंने हां में सिर हिलाते हुए जवाब दिया।

दोनों की लार टपकाती आँखें मुझे पल पल मजा दे रही थी कि शायद इस बार थ्री सम होगा।

अब मैं बेहतर महसूस कर रही थी पर खट्टी डकारें अब भी आ रही थी।

धीरज थोड़ी पीछे हटे और दीपक ने मेरी कमर में हाथ डाल दिया और बोले- चलो अब बस में चलते हैं. वैसे भी काफी देर हो गई है रास्ते में ही! थोड़ा ही रास्ता है, वहां चल के कमरे में आराम कर लेना।

उनका हाथ फिर मेरी टीशर्ट के ऊपर से ब्रा टटोलने लगा।
धीरज पीछे चलते हुए सब देख रहे थे।

जाने क्यों मैं भी दीपक और धीरज की ओर खिंची चली जा रही थी.
हालांकि मैं दफ्तर में अपनी छवि साफ बनाए रखना चाहती थी पर थ्रीसम का भूत भी सवार था और इन दोनों मर्दों की लालसा देख मेरी चूत भी गीली हो चली थी।

बस के करीब आते ही दीपक ने अपना हाथ मेरी कमर से हटा लिया.
मैं समझ गई कि वो भी सब गुप्त रखना चाहते हैं.

ऐसे में मैं मन ही मन यह योजना बनाने लगी कि कैसे इन दोनों के नीचे लेट इनके लौड़े लिए जायें।

दीपक और धीरज को ये लगे कि ये मेरा फायदा उठा रहे हैं और सब उन्होंने किया.
यदि मैंने अपनी इच्छा जाहिर की तो हो सकता है, जब तक मैं इस दफ्तर में काम करूं, तब तक मुझे इनकी रण्डी बन ना पड़े।

जो मैं खुद तय करना चाहती थी उनसे चुदने के बाद!
कि वो मुझे अपनी रण्डी बनाने लायक हैं या नहीं।

मैं वापिस आकर अपनी सीट पर जा ही रही थी कि धीरज ने कहा- पीछे की सीट पर जगह ज्यादा है, तुम वहां आराम से लेट जाओ।

मेरी भी अब ठरक जाग उठी थी तो मैंने मना नहीं किया और वापिस उन दोनों के बीच में आकर बैठ गई।
दीपक बोले- लेटना चाहती हो तो लेट जाओ.

एक कोने पे दीपक थे और दूसरे कोने पर धीरज, चाहे जिस भी दिशा में लेटने पर, दोनों में से एक तो मेरे चूचों के दर्शन करता ही!
दीपक मेरे स्तन पहले ही देख चुके थे तो मैं धीरज की तरफ सिर रख कर लेट गई।

चोर आँखों से दीपक की नजर बार बार मेरी दोनों टांगों के बीच फसी तंग पजामी पर जा रही थी, मेरी जाँघों के बीच बनी कैमल टो से वो भांप रहे थे मेरी चूत की संरचना को!

मैंने अपना दाहिना बाज़ू आँखों पर रख, धीरज को खुला निमंत्रण दिया कि वो खुल के मेरे स्तन देखे.
मेरी आँखें बंद पाकर धीरज ने शर्माना छोड़ दिया और मेरी तरफ घूम के बैठ गए.

मैं धीरज और दीपक में होती हुई हल्की हल्की फुसफुसाहट सुन पा रही थी।

धीरज फुसफुसाते हुए बोले- बहुत गर्म माल है!
दीपक की बहुत धीमी सी फुसफुसाहट आई- तो ठंडा कर देंगे.
और दोनों हंसने लगे।

मैं नींद में होने का ड्रामा करने लगी।

और देखते ही देखते मुझे धीरज का हाथ मेरे गले से होते हुए मेरी चूचियां छूता महसूस हुआ; बिल्कुल हल्के हाथों से, ताकि वो मुझे गलती से जगा ना दें।
मैं मन ही मन बोल रही थी- जोर से दबा ना लोड़ू, निचोड़ दे मेरी चूचियां!

उधर दूसरी तरफ से एक उंगली धीरे धीरे मेरी टांगों के बीच फिरती सी महसूस हुई.
मेरी चूत अब ये सब संभाल नहीं पा रही थी।
मैं सुबह से ही गीली थी, इन दोनों के छूने से अब पानी कच्छी से बाहर बहने लगा।

इससे पहले की दीपक जान पाते, मैं थोड़ा हिली.
तो धीरज और दीपक, दोनों ने अपने अपने हाथ पीछे खींच लिए।

मुझे बिना ब्रा, बिना कच्छी पहने, नंगी सोने की आदत है।
घर में भी मैं नंगी सोती हूं आज के समय में भी!
रात में मेरी गर्मी से कमरा गर्म हो जाता है तो नंगी AC के नीचे टांगें फैला के सोती हूं, कभी शायद मेरा कोई दीवाना चुपके से मेरे कमरे में आए तो उसे मुझे चोदने में तकलीफ ना हो!

खैर, नंगी सोने की इस आदत के कारण मैं बहुत असहज महसूस कर रही थी.
मैंने कुर्ती के बाहर से ही अपनी ब्रा खोल ली.

ये दीपक ने भी देखा, अब वो मचल रहे थे मेरे चूचे भींचने के लिए!
पर संकोच कर रहे थे.
आखिर वो काफी बड़े ओहदे पे थे, मेरे साथ कोई छेड़खानी करना उनकी नौकरी को खतरे में डाल सकता था।

मैं फिर कुछ ही देर में सोने का नाटक करने लगी.

तभी धीरज ने दीपक को ऊंचे स्वर में कहा- उस तरफ तो काफी अच्छी मनमोहक दृश्य आ रहे हैं, क्या तुम मेरे साथ अपनी सीट बदलोगे?
दीपक की लॉटरी लग गई।

धीरज ने मुझे जगाया कि उन्हें उस तरफ जाना है, थोड़ी जगह दूं.
मैं उठ के बैठ गई, धीरज और दीपक ने अपनी अपनी सीट की अदला बदली कर ली।

अब मेरे बड़े बड़े चूचे दीपक की पहुंच से ज्यादा दूर नहीं थे।
मैं वापिस लेट कर कुछ देर बाद दोबारा सोने का नाटक करने लगी।

कुछ देर में दीपक के हाथ मुझे मेरे चूचों पर महसूस हुए, वो बड़े प्यार से मेरे निप्पल सहला रहे थे, मेरे निप्पल भी कड़क होने लगे थे।

उन्होंने मेरी कुर्ती थोड़ी नीचे कर दी और बस की खिड़की से आती रोशनी से मेरे चमकते सफेद दूध देखने लगे।

मैं मन ही मन चाहती थी कि दीपक अपना मुंह मेरे चूचों में गड़ा दें और मेरे उरोजों का रसपान करें; पूरी बस के सामने मुझे नंगी कर सीट पर झुका के चोदें। और फिर एक एक कर बस में बैठे लड़के और लड़कियां सभी मेरी जवानी के मज़े लूटें।

मैं जल्द ही अपनी इस Xxx डिजायर की काल्पनिक दुनिया से बाहर आई.
जैसे ही बस ने ब्रेक मारी, दीपक ने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया.

मैं आँखें मसलती हुई उठने का नाटक करने लगी।

हमारी बस रिसॉर्ट पहुंच चुकी थी और मैं मन में तरकीब लगा रही थी कि कैसे चुदूँ.
खुद सामने आकर वो चोदने की बात कतई नहीं करेंगे. नौकरी सबको प्यारी होती है, जब आप एक रौबदार ओहदे पर हों।

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Xxx डिजायर कहानी का अगला भाग:

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